पंचकल्याणक महोत्सव ?

पंचकल्याणक महोत्सव

  • देखो ! इस प्रतिष्ठा महोत्सव में यदि आत्मा के स्वभाव को समझे तो आत्मा में धर्म की प्रतिष्ठा होगी । वास्तव में जो चैतन्य के भान सहित पंचकल्याणक देखता है, उसने ही भगवान के पंचकल्याणक साक्षात देखे ।
  • यहां पंचकल्याणक महोत्सव में भी आत्मा को समझने की ही मुख्यता है । यह महोत्सव अनंत भवों का नाश करनेवाला है । भगवान ने आत्मा का जैसा स्वरूप बताया है, वैसा जानना और मानना ही सच्चा महोत्सव है ।
 
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गर्भ कल्याणक (पूर्व रूप)

गर्भ कल्याणक (पूर्व रूप)

  • श्री तीर्थंकर भगवान के आत्मा को पूर्वभव में आत्मभान सहित शुभ-विकल्प उठने पर तीर्थंकर नामकर्म बंधता है ।
    तीर्थंकर होनेवाले विशिष्ट जीवों को ही वह प्रकृति बंधती है ।
  • माता के गर्भ में तीर्थंकर भगवान के आत्मा के आने के छ्ह माह पहले से देवता, माता की सेवा करने के लिए आते हैं । वे कहते हैं – “अहो माता ! आप धन्य हैं । आप न केवल भगवान की माता हो, बल्कि सारे जगत की माता हो ।” – इत्यादि अनेक प्रकार से वे माता की भक्ति करते हैं और कुबेर उनके घर पर सदा रत्नवर्षा करते हैं ।
 

गर्भ कल्याणक (उत्तर रूप)

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  • छह माह बाद माता को सोलह स्वप्न आते हैं और उनके गर्भ में भगवान का जीव आता हैं । माता के गर्भ में भगवान का आत्मा, सम्यग्दर्शन और सम्यक मति-श्रुत-अवधिज्ञान सहित ही आता है ।
  • अहो ! भगवान तो माता के गर्भ में अवतार लेते समय भी चैतन्य स्वरूप शुद्धात्मा के भान सहित थे । अरे ! धर्म का आधार तो आत्मा ही है, जबकि लोग बाह्य क्रिया के आधार से धर्म मानकर भटक रहे हैं ।
 
  • छह महीने के अनंतर एक दिन रात्रि के पिछले भाग में माता को सोलह स्वप्न दिखाई देते हैं जो कि क्रम से १. ऐरावत हाथी, २. बैल, ३. सिंह, ४. हाथियों द्वारा अभिषेक होती हुई लक्ष्मी, ५. दो मालायें, ६. चंद्रमा, ७. उगता हुआ सूर्य, ८. मीन युगल, ९. जल से भरे दो कलश, १०. कमल सहित सरोवर, ११. महासमुद्र, १२. सुवर्णमय सिंहासन, १३. देव विमान, १४. नागेन्द्रभवन, १५. महारत्नराशि, १६. निर्धूम अग्नि।
  • इन स्वप्नों को देखकर माता निद्रा को दूर कर प्रात: क्रिया से निवृत होकर राजदरबार में राजा के पास पहुँचती हैं और यथायोग्य आसन पर बैठकर हाथ जोड़कर विनयपूर्वक अपने स्वप्नों को निवेदित करती हैं।
  • उन्हें सुनकर महाराज प्रत्युत्तर में कहते हैं कि— हे प्रिये!
  • निश्चय ही आज तुम्हारे गर्भ में तीन लोक के नाथ तीर्थंकर ने अवतार ले लिया है। लगातार छह मास से होने वाली रत्नों की वर्षा और देवियों के द्वारा की हुई शुश्रूषा से हम दोनों को जिनेंद्रदेव के जिस जन्म की सूचना मिली थी वह आज सफल हुई है। यह सुनकर कांति को धारण करती हुई माता अतीव प्रसन्नता को प्राप्त हो जाती हैं।
  • क्रम—क्रम से गर्भ की वृद्धि होने पर भी माता की त्रिवलि की शोभा भंग नहीं होती है। तीर्थंकर शिशु का गर्भ में निवास वैसा ही होता है कि जैसा जल में प्रतिबिंबित सूर्य का होता है। मति, श्रुत, अवधि इन तीन ज्ञानरूपी नेत्रों के द्वारा जगत को देखते हुये जिन बालक, दिक्कुमारियों के द्वारा शुद्ध किये हुये गर्भ में नौ मास तक सुख से स्थित रहते हैं। गर्भ में आने के नौ माह पूर्ण होने तक लगातार रत्नों की वर्षा होती रहती है।

जन्म कल्याणक

जन्म कल्याणक

आज भगवान के जन्मकल्याणक महोत्सव का प्रसंग है । तीर्थंकर देवों का जन्म शुद्धात्मा के भान सहित ही होता है । देव और देवियां उनकी सेवा करती हैं, रत्नों की वर्षा होती है, इन्द्र आकर जन्मकल्याणक महोत्सव मनाते हैं – यह तो सब पुण्य का प्रभाव है । अहो, ऐसा पुण्य किसे बंधता है? जिसे आत्मा का भान हो और पुण्य की भावना न हो, उसे ही ऐसा पुण्य बंध जाता है ।

 

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दीक्षा कल्याणक

दीक्षा कल्याणक

  • यहां स्थापना-निक्षेप से तीर्थंकर भगवान का दीक्षाकल्याणक मनाया जा रहा है । पूर्व में जो तीर्थंकर भगवान हो गये हैं, उन्हें वर्तमान ज्ञान में याद करके स्थापना की
    जाती है । आत्मा को सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान होने के बाद चारित्रदशा हुए बिना मुक्ति नहीं होती ।
  • तीर्थंकर भगवान को भी मुनिदशा हुए बिना कभी मुक्ति प्रकट नहीं होती । इसलिए वैराग्य होने पर वे स्वयं दीक्षा अंगीकार करते हैं, आत्मध्यान में लीन होते हैं और उन्हें तुरन्त सातवां गुणस्थान और मन:पर्ययज्ञान प्रकट हो जाता है ।
 

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केवल ज्ञान कल्याणक

केवल ज्ञान कल्याणक

  • जब अभेद चैतन्य स्वभाव में स्थिरता द्वारा चैतन्य में भेद करनेवाले औपाधिकभाव नष्ट होने पर अखण्ड केवलज्ञान द्वारा आत्मा प्रत्यक्ष ज्ञात होता है, तब वाणी भी सहज ही अभेद हो जाती है । भगवान के आत्मा ने सर्वज्ञता प्रकट की और समवसरण में उनकी ‘ॐ ’ ध्वनि खिरी ।
  • भगवान अपने उपदेश में यही कहते हैं कि “हे भव्यजीवो ! तुम अपने ज्ञान में सर्वज्ञ का निर्णय करो । तुम्हारे आत्मा में भी सर्वज्ञ स्वभाव भरा है, तुममें भगवान बनने की पूर्ण सामर्थ्य भरी है, उसकी श्रद्धा करके उसका सेवन करो तो परमात्मदशा प्रकट हो”।
 

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मोक्ष कल्याणक

मोक्ष कल्याणक

हे जीवो ! मैं सिद्ध हूँ और तुम भी सिद्ध हो, तुम्हारे आत्मा में सिद्धपना समा जाये – ऐसी ताकत है । जो ज्ञान सिद्धों को जानकर अपने में सिद्धपने की स्थापना करता है, उस ज्ञान में सिद्ध जैसी सामर्थ्य है । भगवान ने क्या करके मोक्ष प्राप्त किया ? भगवान ने परजीवों का कुछ नहीं किया, बल्कि सर्वप्रथम अपने आत्मा में भेदविज्ञान प्रकट किया ।

 

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